पूज्य गुरुदेव सुदर्शन लाल जी महाराज
॥ अहिंसा परमो धर्मः ॥

पूज्य गुरुदेव
सुदर्शन लाल जी महाराज

अहिंसा • संयम • त्याग • स्वाध्याय • सेवा • आत्मकल्याण

“जियो और जीने दो”
जीवन परिचय

मानवता, संयम और धर्म के लिए समर्पित जीवन

गुरुदेव श्री सुदर्शन लाल जी महाराज का जन्म 4 अप्रैल 1923 को रोहतक क्षेत्र में हुआ। उपलब्ध जैन स्रोतों के अनुसार उन्होंने 18 जनवरी 1942 को संग्रूर, पंजाब में दीक्षा ग्रहण की और गुरुदेव श्री मदन लाल जी महाराज के शिष्य बने।

उनका जीवन जैन धर्म के सिद्धांतों, आत्म-साधना, अहिंसा, सादगी और मानव-कल्याण के संदेश को जन-जन तक पहुँचाने में समर्पित रहा।

25 अप्रैल 1999 को उनका देवलोकगमन हुआ, लेकिन उनके विचार और शिक्षाएँ आज भी अनुयायियों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।

जीवन यात्रा

प्रमुख पड़ाव — एक प्रेरणादायक Timeline

1923

जन्म

4 अप्रैल 1923 को रोहतक क्षेत्र में जन्म।

1942

दीक्षा

18 जनवरी 1942 को संग्रूर में जैन साधु जीवन की दीक्षा ग्रहण की।

1942–1963

साधना और धर्म-प्रचार

संयम, अध्ययन, साधना और जैन सिद्धांतों के प्रचार-प्रसार में सक्रिय रहे।

1963

संघ नेतृत्व

गुरुदेव मदन लाल जी महाराज के देवलोकगमन से पूर्व उन्हें मुनि मंडल का मुखिया बनाया गया।

1999

देवलोकगमन

25 अप्रैल 1999 को देवलोकगमन; उनकी शिक्षाओं की प्रेरणा आज भी जारी है।

जीवन शैली

गुरुदेव की जीवन शैली से मिलने वाली प्रेरणा

☘

अहिंसा

प्रत्येक जीव के प्रति करुणा और किसी को कष्ट न पहुँचाने की भावना।

◉

संयम

इंद्रियों, विचारों और व्यवहार पर अनुशासन तथा आत्म-नियंत्रण।

♢

अपरिग्रह

अनावश्यक संग्रह और भौतिक आसक्ति से दूर रहने की प्रेरणा।

ॐ

स्वाध्याय

ज्ञान, आत्मचिंतन और धार्मिक अध्ययन द्वारा जीवन को प्रकाशित करना।

♥

सेवा

मानवता और समाज के कल्याण के लिए निस्वार्थ भाव से कार्य करना।

☀

आत्मकल्याण

आत्मनिरीक्षण, अपनी भूलों का सुधार और आध्यात्मिक उन्नति।

Scroll to Top